पशुओं के प्रमुख रोग तथा आरोग्य रखने के उपाय व उपचार

मवेशी या अन्य पशुधन के बीमार हो जाने पर उनका इलाज करने के वनिस्पत उन्हें तंदुरूस्त बनाये रखने का इंतजाम करना ज्यादा अच्छा है। कहावत प्रसिद्ध है “समय से पहले चेते किसान”। पशुधन के लिए साफ-सुथरा और हवादार घर – बथान, सन्तुलित खान – पान तथा उचित देख भाल का इंतजाम करने पर उनके रोगग्रस्त होने का खतरा किसी हद तक टल जाता है। रोगों का प्रकोप कमजोर मवेशियों पर ज्यादा होता है। उनकी खुराक ठीक रखने पर उनके भीतर रोगों से बचाव करने की ताकत पैदा हो जाती है। बथान की सफाई परजीवी से फैलने वाले रोगों और छूतही बीमारियों से मवेशियों का रक्षा करती है। सतर्क रहकर पशुधन की देख – भाल करने वाले पशुपालक बीमार पशु को झुंड से अलग कर अन्य पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं।
पशु आरोग्य से तात्पर्य उन नियमों और उपायों से है जिनके अपनाने से पशुओं को स्वस्थ रखा जा सकता है।

वर्तमान में पशुओं की मृत्यु दर लगभग 10% है। प्रायः पशु असन्तुलित आहार, अल्पाहार, दवा और चिकित्सा का अभाव और परजीवियों के कारण मरते हैं।

पशु को स्वस्थ रखने के लिए निम्न उपाय किये जाने चाहिए

• सूर्य चिकित्सा के आविष्कारकर्ता पंलिझन होन के अनुसार – सूर्य की किरणों में जीवाणु एवं विषाणु नाशन की अपूर्व क्षमता होती है।
• व्यायाम कराने से पशुओं के सभी अंगों में रक्त संचार सुधरता है।
• रोगी, कमजोर, गाभिन और अपाहिज पशुओं को टहला व वयस्क सांड़ और विश्रामावस्था में कार्यशील नर पशुओं को हल्का अथवा तेज दौड़ाकर व्यायाम करना चाहिए।
• स्नान व तैराने से पशु के शरीर पर धूल, पसीना, परजीवी, रक्त एवं चर्म विकार नष्ट हो जाते हैं। तथा त्वचा के छिद्र खुल जाते हैं।
• रोगी, वृध्द, अपाहिज और गाभिन पशुओं को तैराना नहीं चाहिए।
• पशुओं को तेज धूप, वर्षा, आंधी व सर्दी आदि से बचाना चाहिए।
• मौसम के प्रकोप के कारण पशुओं में लू, सर्दी, कफ और निमोनिया आदि रोग हो जाते हैं।
• पशु आहार में किसी भी तत्व की कमी होने पर उसकी कमी से उत्पन्न होने वाले रोग लग जाते हैं।
• कम ऊर्जा वाले राशन से पशु कमजोर तथा अधिक ऊर्जा वाले राशन से पशुओं में मोटापा तथा प्रजनन सम्बन्धी विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
• मनोवैज्ञानिक कारणों से पशुओं में अऋतुकाल, दूध चढ़ाना, असामान्य स्वभाव तथा अधैर्य (Nervous) इत्यादि उत्पन्न हो जाते हैं।
• संक्रामक बीमारी से पीड़ित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए

पशुओं को दवा देने की विधि:

01. बांस या बोतल से पानी के साथ घोलकर पिलाना।
02. चटनी, लोए (Bolus), गोली (Pills) तथा कैप्सूल के रूप में दवा खिलाना।
03. एनीमा द्वारा जब पशु खाने में असमर्थ हो।
04. दवा का वफारा-सांस की बीमारियों में दिया जाता है।
05. पुल्टिस – अलसी की पुल्टिस फोड़ा पकने में या सेंक लगाने के लिए।
06. सुई द्वारा (By Injection) यह तीन प्रकार से हो सकता है –
(i) त्वचा के अन्दर (Subcutaneous)
(ii) माँसपेशी के अन्दर (Intra muscular)
(iii) सिरा के अन्दर (Intravenous)

पशु चिकित्सा में प्रयोग की जाने वाली साधारण औषधियाँ:

01. मैग्नीशियम सल्फेट – यह रंगहीन, गंधहीन, रवेदार पदार्थ है। इसे मैगसल्फ के नाम से भी जाना जाता है। इसका जुलाब के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्रति बड़े पशु मात्रा 250-300 ग्राम। 

02. अण्डी का तेल – इसका तेल गाढ़ा होता है। बड़े पशु को 500 से 600 ग्राम व बच्चों को 30 से 60 ग्राम की मात्रा जुलाब के रूप में दिया जाता है। 

03. फिनाइल – कीटाणुनाशक, खुरपका मुंहपका रोग में खुर धोने के लिए 5% तथा मुंह के अन्दर लगाने के लिए 10% का घोल प्रयोग किया जाता है।

04. कार्बोलिक एसिड – कीटाणुनाशक, घाव धोने में 1% व फर्स, आदि धोने में 5% घोल प्रयोग में करते हैं। 

05. पोटेशियम परमैंगनेट – कीटाणुनाशक, रंग लाल, 5% का घोल साधारण सफाई में और 0.1% से 1% का घोल घाव धोने में। सांप काटने पर इसके रवों का प्रयोग किया जाता है। इसे लाल दवा के नाम से भी जाना जाता है।

06. लाइसोल – 2% का घोल बच्चेदानी के धोने में तथा 1% का घोल अन्य कार्यों में प्रयोग किया जाता है। 

07. कपूर – इसको 6-8 गुना सरसों या जैतून के तेल में मिलाकर चोट, मोच, दर्द में मालिश करते हैं। यह उत्तेजक होता है। 2-4 ड्रॉप खांसी व जुकाम में देते हैं। 

08. एल्कोहल (शराब) – यह उत्तेजक होता है। यह कमजोरी अवस्था में या पाचन क्रिया मन्द होने पर 100-150 मिली प्रति पशु देते हैं। 

09. नीला थोथा तूतिया – यह कॉपर सल्फेट होता है। इसका उपयोग पेट के कीड़े मारने, त्वचा के परजीवियों को मारने में किया जाता है। खुरपका के छालों के ऊपर 1% का घोल दिन में 5-6 बार डाला जाना चाहिए।

10. फिटकरी – यह द्रवों को जमाती व तन्तुओं को संकुचित करती है। खून को बहने से रोकती है। इसका 2 से 5% का घोल प्रयोग में लाया जाता है। 

11. टिंचर ऑफ आयोडीन – इसमें आयोडीन, पोटेशियम डाई-क्लोराइड, पानी और एल्कोहल होता है। यह एन्टीसेप्टिक, डिसइन्फेक्टेन्ट, पैरासाइटी साइड, एक्सपेक्टोरेन्ट है। 

12. तारपीन का तेल – इस तेल का एक भाग, सरसों के तेल का 4 भाग, अमोनियम फोर्ट एक भाग और पानी आधा भाग में फेंटकर चोट, मोच, गठियां पर मालिश करते हैं। 

13. सरसों का तेल – खून का दौरान कम होने पर इससे मालिश की जाती है। कुपच होने पर बच्चों को 50 ग्राम व बड़े जानवरों को 200 से 300 ग्राम दिया जाता है। 

14. कत्था या खड़िया – पेचिश व दस्त रोकने में प्रयोग की जाती है। 30 ग्राम खड़िया, 15 ग्राम कत्था व 200 ग्राम बेलगूदा मिला कर देना चाहिए।

15. कलमी शोरा – पानी में घोलकर पिलाने से खून बन्द करता है। यह बुखार में भी प्रयोग होता है।
इनके अतिरिक्त सौंफ पेट की खराबी में, 30 से 60 ग्राम, हींग अफरा व मरोड़ में 2-4 ग्राम, काला नमक हाजमा ठीक करने के लिए 2-4 ग्राम, सोहागा मुंह का जख्म धोने के लिए (3 भाग सुहागा, 22 भाग ग्लिसरीन), सौंठ ऐंठन कम करता है तथा गर्मी पैदा करता है खुराक 4 से 8 ग्राम, भाँग दर्द कम करता है खुराक 1 से 2 ग्राम, ईसबगोल दस्त में 30-60 ग्राम, कुचला बलवर्धक तथा हाजमा ठीक करता है। खुराक 1 से 2 ग्राम।

सामान्य व्याधियों का उपचार

01. घाव – घाव से खून बन्द करने के लिए रुई को 1% फिटकरी या फिनायल के घोल में मिलाकर व निचोड़ कर घाव में भरकर तथा 10-15 मिनट तक इस रुई को हाथ से दबाए रखें। खून बन्द होने पर प्रतिदिन 1 भाग फिनाइल 8 भाग सरसों या अलसी के तेल में घोल बनाया हुआ लेप लगाकर पट्टी बाँधनी चाहिए। खुर पर घाव होने पर खुर को 1% तूतिया के घोल में 15-20 मिनट प्रति दिन डुबोना चाहिए।
आग से जले घाव पर चूने का पानी और अलसी का तेल बराबर भाग मिलाकर खूब फैंटकर लगाना चाहिए। थन पर घाव होने पर थन को पोटाश से धोकर बोरिक एसिड प्रतिदिन लगाना चाहिए। 

02. मोच – ताजी मोच ठण्डे पानी से सेंक दी जाए और ठण्डे पानी की पट्टी बांध दी जाए। पुरानी चोट गरम पानी में नमक डालकर सेंका जाए। इसके बाद अलसी का तेल 400 मिली, कपूर 20 ग्राम, तारपीन का तेल 40 मिली मिलाकर हल्के हाथ से मालिश की जावें। इसके ऊपर कोरी रुई की पट्टी बांध दी जाए।

03. खुजली – खुजली वाले स्थान के बाल काटकर साबुन से धोना चाहिए। 2 भाग गन्धक, 8 भाग अलसी का तेल तथा 1 भाग कोलतार मिलाकर मिश्रण को खुजली वाले स्थान पर दिन में दो बार लगाएं। 

04. पेचिश – इसमें पेट में मरोड़ व गोबर के साथ सफेद या लाल म्यूकस जैसा पदार्थ आता है। इसके लिए खड़िया मिट्टी 20 से 30 ग्राम, कत्था 30 से 60 ग्राम व बेल का गूदा 300 ग्राम मिलाकर देना चाहिए। 

05. कब्ज – इसमें गोबर कड़ा होकर निकलता है जिससे पशु को तकलीफ होती है। इसमें किसी परगेटिव जैसे अण्डी का तेल, ईसबगोल की भूसी देनी चाहिए। 

06. अफरा – गले-सड़े पदार्थों को खाने से अधिक गैस बनती है एवं पशु का पेट फूल जाता है। 50 मिली तारपीन का तेल, 40 ग्राम हींग, 160 ग्राम नौसादर, 500 मिली अलसी के तेल में मिलाकर पिलाएं। बच्चों को इस खुराक की 1/4 मात्रा दें।
यदि पेट फूलना बन्द नहीं हो रहा है और पशु की हालत चिन्ताजनक है तो पशु के बायीं ओर कोख के मध्य में ट्रोकर और केनुला घुसेड़कर गैस निकाल देना चाहिए। गैस कम होने पर 2-3 चम्मच फार्मेलीन केनुला द्वारा पेट में पहुंचा देना चाहिए जिससे पेट में कोई बाहरी जीवाणु जीवित न रह सके। 

07. जेर न गिरना – पशु की जेर न गिरने पर 50 ग्राम अजवाइन, मैंथी, सौंठ प्रत्येक 250 ग्राम, गुड़ 250 ग्राम व टिन्चर इरगट 10 ड्राप, 1 लीटर पानी में मिलाकर व उबालकर पशु को दे दें। आवश्यकता पड़ने पर 4 घंटे बाद दुबारा दें। 

08. खुरों का दुखना – पशुओं को गीली व गन्दी जगह पर बाँधने से खुर दुखने लगते हैं। कभी-कभी पत्थर काँटे आदि लगने से भी यह रोग हो जाता है। उपचार के लिए प्रभावित पैर से सारी गन्दगी साफ करके 1% नीला थोथा के गर्म घोल में खुर को आधे घण्टे तक डुबोएं। बाद में उसे सुखाकर टिन्चर आयोडीन पट्टी बाँध दें।

09. सींग टूटना – पूरा सींग टूट जाने पर लोहे से दाग कर खून का बहना रोकें और उस पर कीटाणुनाशक दवा लगाकर पट्टी बांध दें। यदि सींग का बाहरी भाग ही टूटा है और भीतरी भाग नहीं तो टिन्चर आयोडीन की पट्टी बाँँधने से ही खून बहना बन्द हो जाता है। यदि सींग के भीतरी और बाहरी दोनों भाग टूट गए हों तो सींग को काटकर एकसार कर दें और उस पर टिन्चर फैरीनरक्लोर या टिन्चर बैंजॉइन डालकर पट्टी बाँध दें।  

10. हड्डी टूटना – गहरी चोट लगने पर पशुओं की हड्डी टूट जाती है। हड्डी के टूटे हुए दोनों भागों को ठीक तरह से जोड़ कर चारों ओर से बाँस की खपच्चियाँ लगाकर उन्हें पट्टी बाँधकर कस दें और पशु को आराम करने दें। पशु चिकित्सक टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के लिए 4 से 6 सप्ताह के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस की पट्टी बाँधते हैं। 

11. आँख दुखना – किसी प्रकार की चोट लगने या आँख में धूल के कण, अनाज के छोटे-छोटे टुकड़े, कीड़े या बाल पड़ जाने से पशुओं आँखें दुखने लगती हैं। पशु की आँख लाल पड़कर दर्द करने लगती है, पलकें सूज जाती हैं और आँखो में पानी जैसा गाढ़ा, क्रीम जैसा तरल पदार्थ निकलने लगता है। आँख को दिन में 3-4 बार बोरिक अम्ल के गर्म लोशन से धोएं तथा “टेरामाइसिन” मलहम आँख में 3-4 बार प्रतिदिन लगाएँ। 

12. नाक से खून गिरना – नाक में चोट लगने या अन्य कारणों से नथुने में खून बह सकता है। खून रोकने के लिए नमक या 5% फिटकरी का घोल या पानी में सिरका घोल कर रोगी पशुओं के नथुने में डालें। पशु का सिर इस अवस्था में रखें कि घोल गले में न पहुँच पाए। नाक पर बर्फ या ठण्डी पट्टियाँ लगाकर पशु को ठण्डे स्थान पर आराम करने दें। कभी-कभी जोंक लग जाने के कारण भी खून आता है। नाक में नमक का घोल डालने से जोंक चलने लगती है और उसे चिमटी से बाहर निकाला जा सकता है। 

13. चर्म रोग – चर्म रोग अनेक कारणों से हो सकते हैं जैसे भौतिक (चोट लगना, जलना) रासायनिक (अम्ल, क्षार, आदि) तथा जैविक (जीवाणु, विषाणु, फफूँद) जो चर्म रोग जैविक कारणों से होते हैं तथा जो पशुओं से मनुष्यों में और मनुष्यों से पशुओं में फैल सकते हैं ऐसे रोगों में फफूँद से होने वाले चर्म रोगों का प्रमुख स्थान है।
रोग की प्रारम्भिक अवस्था में कोई विशेष लक्षण नहीं दिखाई पड़ता। बाद में चमड़ी के भाग पर फफूँद की बढ़वार के समय कुछ विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं जिनके कारण रोगी खुजली व जलन अनुभव करता है। रोगग्रस्त स्थान पर रक्त संचार बढ़ जाता है और रोगी की त्वचा लाल हो जाती है। फफूँद मूल स्थान से हटकर चारों ओर बढ़ने लगती है। चमड़ी पर धीरे-धीरे बाल गिरने लगते हैं और चकते बाल रहित हो जाते हैं। चकते अधिकतर शुष्क होते हैं और पतली पपड़ी या
खुरंट छूटते दिखाई पड़ते हैं। कभी-कभी हल्का पीला द्रव या अधिक खुजलाने पर रक्त भी निकलता दिखाई पड़ता है। बाद में ऐसे स्थानों पर खाल कड़ी व मोटी हो जाती है। पशुओं को समय-समय पर नहलाएं तथा रोग होने पर शीघ्र ही उपचार करवाएँ। सेलिसिलिक एसिड (2.0%) तथा बैंजॉइक अम्ल (6%) से बना मरहम उपयोगी है। पुराने सूखे दाद पर टिन्चर आयोडीन व गन्धक लगाएँ। कभी-कभी रोग स्वतः ही ठीक हो जाता है

सफल पशुपालन हेतु पशुपालकों और किसानों को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए

1. पशुधन या मवेशी को प्रतिदिन ठीक समय पर भर पेट पौष्टिक चार-दाना दिया जाए। उनकी खुराक में सूखा चारा के साथ हरा चारा खल्ली – दाना और थोड़ा- सा नमक शामिल करना जरूरी है।

2. साफ बर्तन में ताजा पानी भरकर मवेशी को आवश्यकतानुसार पीने का मौका दें।
3. मवेशी का बथान साफ और ऊँची जगह पर बनाए। घर इस प्रकार बनाएं कि उसमें सूरज की रौशनी और हवा पहुँचने की पूरी – पूरी गूंजाइश रहे। घर में हर मवेशी के लिए काफी जगह होनी चाहिए।
4. बथान की नियमित सफाई और समय- समय पर रोगाणुनाशक दवाएँ जैसे फिनाइल या दूसरी दवा के घोल से उसकी धुलाई आवश्यक है।
5. मवेशियों या दुसरे पशुधन के खिलाने की नाद ऊँची जगह पर गाड़ी जाए। नाद के नीचे कीचड़ नहीं बनने दें।
6. घर बथान से गोबर और पशु- मूत्र जितना जल्दी हो सके खाद के गड्ढे में हटा देने का इंतजाम किया जाए।
7. बथान को प्रतिदिन साफ कर कूड़ा – करकट को खाद के गड्ढे में डाल दिया जाए।
8. मवेशियों को प्रतिदिन टहलने – फिलने का मौका दिया जाए।
9. मवेशियों के शरीर की सफाई पर पूरा – पूरा ध्यान दिया जाए।
10. उनके साथ लाड़ – प्यार भरा व्यवाहर किया जाए।
11. मवेशियों में फैलनेवअधिकतर संक्रामक रोग (छूतही बीमारियाँ) एंडेमिक यानी स्थानिक होते हैं। ये बीमारियाँ एक बार जिस स्थान पर जिस समय फैलती है, उसी स्थान पर और उसी समय बार- बार फ़ैला करती है। इसलिए समय से पहले ही मवेशियों को टिका लगवाने का इंतजाम करना जरूरी है। टिका पशुपालन विभाग की ओर से उपलब्ध रहने पर नाम मात्र का शुल्क लगाया जाता है। खुरहा – मुहंपका का टिका प्रत्येक वर्ष पशु स्वास्थ्य रक्षा पखवाड़ा के अंतर्गत मुफ्त लगाया जाता है।

मवेशियों के प्रमुख रोग :

मवेशियों के कई तरह के रोग फैलते हैं। मोटे तौर पर इन्हें निमनंकित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –

क. संक्रामक रोग या छूतही बीमारियाँ।
ख. सामान्य रोग या आम बीमारियाँ।
ग. परजीवी जन्य रोग।

संक्रमक रोग (छूतही बीमारियाँ):

संक्रामक रोग संसर्ग या छूआ – छूत से एक मवेशी से अनेक मवेशी से अनेक मवेशियों में फ़ैल जाते हैं। किसानों को इस बात का अनुभव है कि ये छूतही बीमारियाँ आमतौर पर महामारी का रूप ले लेती है। संक्रामक रोग प्राय: विषाणुओं द्वारा फैलाये जाते हैं, लेकिन अलग – अलग रोग में इनके प्रसार के रास्ते अलग – अलग होते हैं। उदहारणत: खुरहा रोग के विषाणु बीमार पशु की लार से गिरते रहते हैं तथा गौत पानी में घुस कर उसे दूषित बना देते हैं। इस गौत पानी के जरिए अनेक पशु इसके शिकार हो जाते हैं। अन्य संक्रामक रोग के जीवाणु भी गौत पानी मृत के चमड़े या छींक से गिरने वाले पानी के द्वारा एक पशु से अनेक पशुओं को रोग ग्रस्त बनाते हैं।

इसलिए यदि गांव या पड़ोस के गाँव में कोई संक्रामक रोग फ़ैल जाए तो मवेशियों के बचाव के लिए निम्नाकिंत उपाय कारगर होते हैं:

1. सबसे पहले रोग के फैलने की सूचना अपने हल्के के पशुधन सहायक या ब्लॉक (प्रखंड) के पशुपालन पदाधिकारी को देनी चाहिए वे इसकी रोग- थाम का इंतजाम तुरंत करते हुए बचाव का उपय बतला सकते हैं।
2. अगर पड़ोस के गाँव में बीमारी फैली हो तो उस गाँव से मवेशियों या पशुपालकों का आवागमन बंद कर दिया जाए।
3. सार्वजनिक तालाब या आहार में मवेशियों को पानी पिलाना बंद कर दिया जाए।
4. सार्वजनिक चारागाह में पशुओं को भेजना तुरंत बंद कर देना चाहिए।
5. इस रोग के आक्रांत पशु को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए।
6. संक्रामक रोग से भरे हुए पशु को जहाँ – तहाँ फेकना खतरे से खाली नहीं। खाल उतारना भी खतरनाक होता है। मृत पशु को जला देना चाहिए या 5-6 फुट गड्ढा खोद कर चूना के साथ गाड़ (विधिपूर्वक) देना चाहिए।
7. जिस स्थान पर बीमार पशु रखा गया हो या मरा हो उस स्थान को फिनाइल की घोल से अच्छी तरह धो देना चाहिए या साफ- सुथरा का वहाँ चूना छिड़क देना चाहिए, ताकि रोग के जीवाणु या विषाणु मर जाएँ।
8. खाल की खरीद – बिक्री करने वाले लोग भी इस रोग को एक गाँव से दुसरे गाँव तक ले जा सकते हैं। ऐसे समय में इसकी खरीद – बिक्री बंद रखनी चाहिए।

अ. गलाघोंटू

यह बीमारी गाय – भैंस को ज्यादा परेशानी करती है। भेड़ तथा सुअरों को भी यह बीमारी लग जाती है। इसका प्रकोप ज्यादातर बरसात में होता है।
लक्षण – शरीर का तापमान बढ़ जाता है और पशु सुस्त हो जाता है। रोगी पशु का गला सूज जाता है जिससे खाना निगलने में कठिनाई होती है। इसलिए पशु खाना – पीना छोड़ देता है। सूजन गर्म रहती है तथा उसमें दर्द होता है। पशु को साँस लेने में तकलीफ होती है, किसी – किसी पशु को कब्जियत और उसके बाद पतला दस्त भी होने लगता है। बीमार पशु 6 से 24 घंटे के भीतर मर जाता है। पशु के मुंह से लार गिरती है।


चिकित्सा – संक्रामक रोग से बचाव और उनकी रोग – थाम के सभी तरीके अपनाना आवश्यक है। रोगी पशु की तुरंत इलाज की जाए। बरसात के पहले ही निरोधक का टिका लगवा कर मवेशी को सुरक्षित कर लेना लाभदायक है। इसके मुफ्त टीकाकरण की व्यवस्था विभाग द्वारा की गई है।

आ. जहरवाद (ब्लैक क्वार्टर)


यह रोग भी ज्यादातर बरसात में फैलता है। इसकी विशेषता यह है कि यह खास कर छ: महीने से 18 महीने के स्वस्थ बछड़ों को ही अपना शिकार बनाता है। इसको सूजवा के नाम से भी पुकारा जाता है।


लक्षण – इस रोग से आक्रांत पशु का पिछला पुट्ठा सूज जाता है। पशु लंगड़ाने लगता है। किसी किसी पशु का अगला पैर भी सूज जाता है। सूजन धीरे – धीरे शरीर के दूसरे भाग में भी फ़ैल सकती है। सूजन में काफी पीड़ा होती है तथा उसे दबाने पर कूड़कूडाहट की आवाज होती है। शरीर का तापमान 104 से 106 डिग्री रहता है। बाद में सूजन सड़ जाती है। तथा उस स्थान पर सड़ा हुआ घाव हो जाता है।


चिकित्सा – संक्रामक रोग से बचाव और रोक – थाम के तरीके, जो इस पुस्तिका में अन्यत्र बतलाए गए है, अपनाए जाएँ। पशु चिकित्सा के परार्मश से रोग ग्रस्त पशुओं की इलाज की जाए। बरसात के पहले सभी स्वस्थ पशुओं को इस रोग का निरोधक टिका लगवा देना चाहिए।

इ. प्लीहा या पिलबढ़वा (एंथ्रेक्स)


यह भी एक भयानक संक्रामक रोग है। इस रोग से आक्रांत पशु की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है। इस रोग के शिकार मवेशी के अलावे भेड़, बकरी और घोड़े भी होते हैं।


लक्षण – तेज बुखार 106 डिग्री से 107 डिग्री तक। मृत्यु के बाद नाक, पेशाब और पैखाना के रास्ते खून बहने लगता है। आक्रांत पशु शरीर के विभिन्न अंगों पर सूजन आ जाती है। प्लीहा काफी बढ़ जाती है तथा पेट फूल जाता है।


चिकित्सा – संक्रामक रोगों की रोक – थाम उनसे बचाव के तरीके अपनाए तथा पशु – चिकित्सा की सेवाएँ प्राप्त करें। यह रोग भी स्थानिक होता है। इसीलिए समय रहते पशुओं को टिका लगवा देने पर पशु के बीमार होने का खतरा नहीं रहता है।

ई. खुरहा – मुहंपका (फूट एंड माउथ डिजीज़)

यह रोग बहुत ही लरछूत है और इसका संक्रामण बहुत तेजी से होता है। यद्यपि इससे आक्रांत पशु के मरने की संभावना बहुत ही कम रहती है तथापि इस रोग से पशु पालकों को को काफी नुकसान होता है क्योंकि पशु कमजोर हो जाता है तथा उसकी कार्यक्षमता और उत्पादन काफी दिनों तक के लिए कम हो जाता है। यह बीमारी गाय, बैल और भैंस के अलावा भेड़ों को भी अपना शिकार बनाती है।


लक्षण – बुखार हो जाना, भोजन से अरुची, पैदावार कम जाना, मुहं और खुर में पहले छोटे – छोटे दाने निकलना और बाद में पाक कर घाव हो जाना आदि इस रोग के लक्षण हैं।


चिकित्सा – संक्रामक रोग की रोक-थाम के लिए बतलाए गए सभी उपायों पर अम्ल करें। मुहं के छालों को फिटकरी के 2 प्रतिशत घोल सा साफ किया जा सकता है। पैर के घाव को फिनाइल के घोल से धो देना चाहिए। पैर में तुलसी अथवा नीम के पत्ते का लेप भी फायदेमंद साबित हुआ है। गाँव में खुरहा – चपका फूटपाथ बनाकर उसमें से होकर आक्रांत पशुओं को गुजरने का मौका देना चाहिए। घावों को मक्खी से बचाना अनिवार्य है।


बचाव – पशु को साल में दो बार छ: माह के अंदर पर रोग निरोधक टिका लगवाना चाहिए।

उ. पशु – यक्ष्मा (टी. बी.)

मनुष्य के स्वस्थ्य के रक्षा के लिए भी इस रोग से काफी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि यह रोग पशुओं का संसर्ग में रहने वाले या दूध इस्तेमाल करने वाले मनुष्य को भी अपने चपेट में ले सकता है।


लक्षण – पशु कमजोर और सुस्त हो जाता है। कभी – कभी नाक से खून निकलता है, सूखी खाँसी भी हो सकती है। खाने के रुचि कम हो जाती है तथा उसके फेफड़ों में सूजन हो जाती है।


चिकित्सा – संक्रामक रोगों से बचाव का प्रबंध करना चाहिए। संदेह होने पर पशु जाँच कराने के बाद
एकदम अलग रखने का इंतजाम करें। बीमारी मवेशी को यथाशीघ्र गो – सदन में भेज देना ही उचित है, क्योंकी यह एक असाध्य रोग है।

ऊ. थनैल

दुधारू मवेशियों को यह रोग दो कारणों से होता है। पहला कारण है थन पर चोट लगना या था का काट जाना और दूसरा कारण है संक्रामक जीवाणुओं का थन में प्रवेश कर जाता। पशु को गंदे दलदली स्थान पर बांधने तथा दूहने वाले की असावधानी के कारण थन में जीवाणु प्रवेश क्र जाते हैं। अनियमित रूप से दूध दूहना भी थनैल रोग को निमंत्रण देना है साधारणत: अधिक दूध देने वाली गाय – भैंस इसका शिकार बनती है।


लक्षण – थन गर्म और लाल हो जाना, उसमें सूजन होना, शरीर का तापमान बढ़ जाना, भूख न लगना, दूध का उत्पादन कम हो जाना, दूध का रंग बदल जाना तथा दूध में जमावट हो जाना इस रोग के खास लक्षण हैं।


चिकित्सा – पशु को हल्का और सुपाच्य आहार देना चाहिए। सूजे स्थान को सेंकना चाहिए। पशूचिकित्सक की राय से एंटीवायोटिक दवा या मलहम का इस्तेमाल करना चाहिए। थनैल से आक्रांत मवेशी को सबसे अंत में दुहना चाहिए।

ऋ. संक्रामक गर्भपात

यह बीमारी गाय – भैंस को ही आम तौर पर होती है। कभी – कभार भेंड बकरी भी इससे आक्रांत हो जाते हैं।


लक्षण – पहले पशु को बेचैनी जाती है और बच्चा पैदा होने के सभी लक्षण दिखाई देने लगते हैं। योनिमुख से तरल पदार्थ बहने लगता है। आमतौर पर पांचवे, छठे महीने ये लक्षण दिखाई देने लगते हैं और गर्भपात हो जाता है। प्राय: जैर अंदर ही रह जाता है।


चिकित्सा – सफाई का पूरा इंतजाम करें। बीमार पशुओं को अलग कर देना चाहिए। गर्भपात के बाद पिछला भाग गुनगुने पानी से धोकर पोंछ देना चाहिए। गर्भपात के भ्रूण को जला देना चाहिए। जिसे स्थान पर गर्भपात हो, उसे रोगाणुनाशक दवा के घोल से धोना चाहिए। पशुचिकित्सक को बुलाकर उनकी सेवाएँ हासिल करनी चाहिए।


नोट – 6 से 8 महीने के पशु को इस रोग (ब्रूसोलेसिस) का टिका लगवा देने से इस रोग का खतरा कम रहता है।

सामान्य रोग या आम बीमारियाँ

संक्रामक रोगों के अलावा बहुत सारे साधारण रोग भी हैं जो पशुओं की उत्पादन – क्षमता कम कर देते है। ये रोग ज्यादा भयानक नहीं होते, लेकिन समय पर इलाज नहीं कराने पर काफी खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। 

नीचे साधारण बीमारियों के लक्षण और प्राथमिक चिकित्सा के तरीके बतलाए जा रहे है।

अ. अफरा

हरा और रसीला चारा, भींगा चारा या दलहनी चारा अधिक मात्रा में खा लेने के कारण पशु को अफरा की बीमारी हो जाती है। खासकर, रसदार चारा जल्दी – जल्दी खाकर अधिक मात्रा में पीने से यह बीमारी पैदा होती है। बाछा – बाछी को ज्यादा दूध पी लेने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। पाचन शक्ति कमजोर हो जाने पर मवेशी को इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है।
लक्षण
1. एकाएक पेट फूल जाता है। ज्यादातर रोगी पशु का बायाँ पेट पहले फूलता है। पेट को थपथपाने पर ढोल की तरह (ढप – ढप) की आवाज निकलती है।
2. पशु कराहने लगता है। फूले पेट के ओर बराबर देखता है।
3. पशु को साँस लेने में तकलीफ होती है।
4. रोग बढ़ जाने पर पशु चारा – दाना छोड़ देता है।
5. बेचैनी बढ़ जाती है।
6. झुक कर खड़ा होता है और अगल – बगल झांकता रहता है।
7. रोग के अत्यधिक तीव्र अवस्था में पशु बार-बार लेटता और खड़ा होता है।
8. पशु कभी – कभी जीभ बाहर लटकाकर हांफता हुआ नजर आता है।
9. पीछे के पैरों को बार पटकता है।

नोट: तुरंत इलाज नहीं करने पर रोगी पशु मर भी सकता है।

चिकित्सा

1. पशु के बाएं पेट पर दबाव डालकर मालिश करनी चाहिए।
2. उस पर ठंडा पानी डालें और तारपीन का तेल पकाकर लगाएँ।
3. मुहं को खुला रखने का इंतजाम करें। इसके लिए जीभी को मुंह से बाहर निकालकर जबड़ों के बीज कोई साफ और चिकनी लकड़ी रखी जा सकती है।
4. रोग की प्रारंभिक अवस्था में पशु को इधर – उधर घुमाने से भी फायदा होता है।
5. पशु को पशुचिकित्सक से परामर्श लेकर तारपीन का तेल आधा से एक छटाक, छ: छटाक टीसी के तेल में मिलाकर पिलाया जा सकता है। उसके बाद दो सूअर ग्राम मैगसल्फ़ और दो सौ ग्राम नमक एक बड़े बोतल पानी में मिलाकर जुलाब देना चाहिए।
6. पशु को लकड़ी के कोयले को चूरा, आम का पुराना आचार, काला नमक, अदरख, हिंग और सरसों जैसी चीज पशुचिकित्सक के परामर्श से खिलायी जा सकती है।
7. पशु को स्वस्थ होने पर थोड़ा – थोड़ा पानी दिया जा सकता है, लेकिन किसी प्रकार का चारा नहीं खिलाया जाए।
8. पशु चिकित्सक की सेवाएँ तुरंत प्राप्त करनी चाहिए।

आ. दुग्ध - ज्वर

दुधारू गाय भैंस या बकरी इस रोग के चपेट में पड़ती है। ज्यादा दुधारू पशु को ही यह बीमारी अपना शिकार बनाती है। बच्चा देने के 24 घंटे के अदंर दुग्ध – ज्वर के लक्षण साधारणतया दिखेते हैं।
लक्षण
1. पशु बेचैन हो जाता है।
2. पशु कांपने और लड़खड़ाने लगता है। मांसपेसियों में कंपन होता है, जिसके कारण पशु खड़ा रहने में असमर्थ रहता है।
3. पलके झूकी – झूकी और आंखे निस्तेज सी दिखाई देती है।
4. मुंह सूख होता है।
5. तापमान सामान्य रहता है या उससे कम हो जाता है।
6. पशु सीने के सहारे जमीन पर बैठता है और गर्दन शरीर को एक ओर मोड़ लेता है।
7. ज्यादातर पीड़ित पशु इसी अवस्था में देखे जाते हैं।
8. तीव्र अवस्था में पशु बेहोश हो जाता है और गिर जाता है। चिकित्सा नहीं करने पर कोई- कोई पशु 24 घंटे के अंदर मर भी जाता है।
चिकित्सा
1. थन को गीले कपड़े से पोंछ कर उसमें साफ कपड़ा इस प्रकार बांध दें कि उसमें मिट्टी न लगे।
2. थन में हवा भरने से लाभ होता है।
3. ठीक होने के बाद 2-3 दिनों तक थन को पूरी तरह खाली नहीं करें।
4. पशु को जल्दी और आसानी से पचने वाली खुराक दें।
5. पशु चिकित्सक का परामर्श लेना नहीं भूलें।

इ. दस्त और मरोड़

इस रोग के दो कारण हैं – अचानक ठंडा लग जाना और पेट में किटाणुओं का होना। इसमें आंत में सुजन हो जाती है।
लक्षण
1. पशु को पतला और पानी जैसे दस्त होता है।
2. पेट में मरोड़ होता है।
3. आंव के साथ खून गिरता है।
चिकित्सा
1. आसानी से पचने वाला आहार जैसे माड़, उबला हुआ दूध, बेल का गुदा आदि खिलाना चाहिए।
2. चारा पानी कम देना चाहिए।
3. बाछा – बाछी को कम दूध पीने देना चाहिए।
4. पशु चिकित्सा की सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।

ई. जेर का अंदर रह जाना

पशु के व्याने के बाद चार – पांच घंटों के अंदर ही जेर का बाहर निकल जाना बहुत जरूरी है। कभी – कभार जेर अंदर ही रह जाता है जिसका कुपरिणाम मवेशी को भुगतना पड़ता है। खास कर गर्मी में अगर जेर छ: घंटा तक नहीं निकले तो इसका नतीजा काफी बुरा हो सकता है। इससे मवेशी के बाँझ हो जाने आंशका भी बनी रहती है। जेर रह जाने के कारण गर्भाशय में सूजन आ जाती है और खून भी विकृत हो जाता है।
लक्षण

1. बीमार गाय या भैंस बेचैन हो जाती है।
2. झिल्ली का एक हिस्सा योनिमुख से बाहर निकल जाता है।
3. बदबूदार पानी निकलने लगता है, जिसका रंग चाकलेटी होता है।
4. दूध भी फट जाता है।

चिकित्सा

1. पिछले भाग को गर्म पानी से धोना चाहिए। ढोते समय इस बात का ख्याल रखें कि जेर में हाथ न लगे।
2. जेर को निकालने के लिए किसी प्रकार का जोर नहीं लागाया जाए।
3. पशु चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

उ. योनि का प्रदाह

यह रोग गाय – भैंस के व्याने के कुछ दिन बाद होता है। इससे भी दुधारू मवेशियों को काफी नुकसान पहूंचता है। प्राय: जेर का कुछ हिस्सा अंदर रह जाने के करण यह रोग होता है।
लक्षण

1. मवेशी का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है।
2. योनि मार्ग से दुर्गन्धयुक्त पिब की तरह पदार्थ गिरता रहता है। बैठे रहने की अवस्था में तरल पदार्थ गिरता है।
3. बेचैनी बहुत बढ़ जाती है।
4. दूध घट जाता है या ठीक से शुरू ही नहीं हो पाता है।
चिकित्सा

1. गूनगूने पानी में थोड़ा सा डेटोल या पोटाश मिलकर रबर की नली की सहायता से देनी गर्भाशय की धुलाई कर देनी चाहिए।
2. पशु चिकित्सक की सहायता लेनी चाहिए।

नोट: इससे पशु को बचाने के लिए सावधानी बरतनी जरूरी है, अन्यथा पशु के बाँझ होने की आशंका रहेगी।

ऊ. निमोनिया

पानी में लगातार भींगते रहने या सर्दी के मौसम में खुले स्थान में बांधे जाने वाले मवेशी को निमोनिया रोग हो जाता है। अधिक बाल वाले पशुओं को यदि ढोने के बाद ठीक से पोछा न जाए तो उन्हें भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण

1. शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
2. सांस लेने में कठिनाई होती है।
3. नाक से पानी बहता है।
4. भूख कम हो जाती है।
5. पैदावार घट जाती
6. पशु कमजोर हो जाता है।

चिकित्सा

1. बीमार मवेशी को साफ तथा गर्म स्थान पर रखना चाहिए।
2. उबलते पानी में तारपीन का तेल डालकर उससे उठने वाला भाप पशुओं को सूँघाने से फायदा होता है।
3. पशु के पांजर में सरसों तेल में कपूर मिलकर मालिश करनी चाहिए।
4. पशु चिकित्सा के परामर्श से इलाज की व्यवस्था करना आवश्यक है।

ऋ. घाव

पशुओं को घाव हो जाना आम बात है। चरने के लिए बाड़ा तपने के सिलसिले में तार, काँटों या झड़ी से काटकर अथवा किसी दुसरे प्रकार की चोट लग जाने से मवेशी को घाव हो जाता है। हाल का फाल लग जाने से भी बैल को घाव हो जाता है और किसानों की खेती – बारी चौपट हो जाती है। बैल के कंधों पर पालों की रगड़ से भी सूजन और घाव हो जाता है। ऐसे सामान्य घाव और सूजन को निम्नांकित तरीके से इलाज करना चाहिए।

चिकित्सा

1. सहने लायक गर्म पानी में लाल पोटाश या फिनाइल मिलाकर घाव की धुलाई करनी चाहिए।
2. अगर घाव में कीड़े हो तो तारपीन के तेल में भिंगोई हुई पट्टी बांध देनी चाहिए।
3. मुंह के घाव को, फिटकरी के पानी से धोकर छोआ और बोरिक एसिड का घोल लगाने से फायदा होता है।
4. शरीर के घाव पर नारियल के तेल में ¼ भाग तारपीन का तेल और थोड़ा सी कपूर मिलाकर लगाना चाहिए।

परजीवी जन्य रोग

बाह्य एवं आन्तरिक परजीवियों के कारण भी मवेशियों को कई प्रकार की बीमारियों परेशानी करती है। इनके बारे में पूरी जानकारी हासिल करने के लिए पशुपालन सूचना एवं प्रसार सेवा, ऑफ पोलो रोड, पटना – 1 से नि: शुल्क छपी हुई पुस्तिकाएँ मंगाकर पढ़ें।

बछड़ों का रोग

निम्नांकित रोग खास कर कम उम्र के बछड़ों को परेशान करते हैं।

अ. नाभि रोग

लक्षण
1. नाभि के आस – पास सूजन हो जाती है, जिसको छूने पर रोगी बछड़े को दर्द होता है।
2. बाद में सूजा हुआ स्थान मुलायम हो जाता है तथा उस स्थान को दबाने से खून मिला हुआ पीव निकलता है।
3. बछड़ा सुस्त हो जाता है।
4. हल्का बुखार रहता है।

चिकित्सा

1. सूजे हुए भाग को दिन में दो बार गर्म पानी से सेंकना चाहिए।
2. घाव का मुहं खुल जाने पर उसे अच्छी तरह साफ कर उसमें एंटीबायोटिक पाउडर भर देना चाहिए। इस उपचार को जब तक घाव भर न जाए तब तक चालू रखना चाहिए।
3. पशु चिकित्सा की सलाह लेनी चाहिए।

आ. कब्जियत

बछड़ों के पैदा होने के बाद अगर मल नहीं निकले तो कब्जियत हो सकती है।

चिकित्सा

1. 50 ग्राम पाराफिन लिक्विड (तरल) 200 ग्राम गर्म दूध में मिलाकर देना चाहिए।
2. साबुन के घोल का एनिमा देना भी लाभदायक है।

इ. सफ़ेद दस्त

यह रोग बछड़ों को जन्म से तीन सप्ताह के अंदर तक हो सकता है। यह छोटे- छोटे किटाणु के कारण होता है। गंदे बथान में रहने वाले बछड़े या कमजोर बछड़े इस रोग का शिकार बनते हैं।

लक्षण

1. बछड़ों का पिछला भाग दस्त से लथ – पथ रहता है।
2. बछड़ा सुस्त हो जाता है।
3. खाना – पीना छोड़ देता है।
4. शरीर का तापमान कम हो जाता है।
5. आंखे अदंर की ओर धंस जाती है।

चिकित्सा

1. निकट के पशु चिकित्सा के परामर्श से इलाज करानी चाहिए।

ई. कौक्सिड़ोसिस

यह रोग कौक्सिड़ोसिस नामक एक विशेष प्रकार की किटाणु को शरीर के भीतर प्रवेश कर जाने के कारण होता है।

लक्षण

1. रोग की साधारण अवस्था में दस्त के साथ थोड़ा – धोड़ा खून आता है।
2. रोग की तीव्र अवस्था में बछड़ा खाना पीना छोड़ देता है।
3. कुथन के साथ पैखाना होता है जिसमें खून का कतरा आता है।
4. बछड़ों कमजोर होकर किसी दूसरी बीमारी का शिकार भी बन सकता है।

चिकित्सा

1. जितना जल्द हो सके पशु चिकित्सक को बुलाकर इलाज शुरू कर देना चाहिए।

उ. रतौंधी

यह रोग साधारणत: बछड़ों को ही होता है। संध्या होने के बाद से सूरज निकलने के पहले तक रोग ग्रस्त बछड़ा करीब – करीब अद्न्हा बना रहता है। फलत: उसने अपना चारा खा सकने में भी कठिनाई होती है। दुसरे बछड़ों या पशु से टकराव भी हो जाता है।

चिकित्सा

1. इन्हें कुछ दिन तक 20 सें 30 बूँद तक कोड लिवर ऑइल दूध के साथ खिलाया जा सकता है।
2. पशु चिकित्सक से परामर्श लिया जाना जरूरी है।

DR. RAJESH KUMAR SINGH

Jamshedpur, Jharkhand, India
rajeshsi[email protected]
9431309542

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