गायो में थनैला रोग: भारतीय श्वेत क्रांति का सबसे बड़ा बाधक

थनैला रोग प्राचीनकाल से ही पशु पालको के लिए गंभीर चिंता का कारण रही है, एवं  पशु धन विकास के साथ ही श्वेत क्रांति की पूर्ण सफलता में अकेले सबसे बड़ी बाधक रही है। इस बीमारी से पूरे भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये का नुकसान होता हैं, जो अतंतः पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता हैं। थनैला रोग  दुधारू पशुओं के थनों का एक गंभीर रोग है, जिसमे प्रभावित पशुओं में  प्रारंभ में थन गर्म हो जाते हैं, दर्द एवं सूजन हो जाती है। शारीरिक तापमान भी कभी- कभी बढ़ जाता हैं। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूध का फट जाना, खून एवं मवाद (पस) भी हो सकता हैं। यह बीमारी समान्यतः  सभी वैसे पशुओं में पायी जाती है, जो अपने बच्चों को दूध पिलातीं हैं। थनैला बीमारी पशुओं में कई प्रकार के जीवाणु, विषाणु, फफूँद एवं यीस्ट तथा मोल्ड के संक्रमण से होता हैं। इसके अलावा चोट तथा मौसमी प्रतिकूलताओं के कारण भी थनैला हो जाता हैं। उक्त कारणों में से रोग का प्रमुख कारण जीवाणु ही होते है, जिनको  कई ग्रुप में विभाजित किया जा सकता है। प्रमुख संक्रामक रोगाणु  स्टेप्टोकोकस की जातियां, कोलाई एवं माइकोप्लाजमा की जातियां आदि हैं। पर्यावरण रोगाणु में स्टेप्टोकोकस डिशप्लैस्टीज, स्टैप्टोकोकस यूबेरिश, कोलीफार्म जीवाणु आदि है।

थनैला रोग के कारण होने वाली आर्थिक हानियां

  • कम दूग्ध उत्पादन: इस रोग में दूग्ध का कम उत्पादन होना ही मुख्य नुकसान का हिस्सा है। संक्रमण के प्रकार, तीव्रता व अवधि के आधार पर कुल दूग्ध उत्पादन का 5 से 25 प्रतिशत नुकसान होता है।
  • दूध की खराब गुणवत्ता: थनैला रोग से ग्रसित दूध की गुणवत्ता में कमी, पशु के दूध में दैहिक कोशिकावो की संख्या बढ़ जाती है, नमक बढ़ जाता है दूग्ध के पोषक घटकों में कमी हो जाती है, जोकि अवाँछनीय है व प्रभावित पशु का दूध मानव उपभोग के लिए सही नहीं रहता है ।
  • दूध का उपयोग न कर पाना : थनैला रोग से पीडि़त पशु के उपचार के दौरान, दूध का उपयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसमें स्वतंत्र एन्टीबॉयोटिक एवं जीवाणुओं की संख्या सबसे अधिक होती है। थनैला रोग में इस्तेमाल एन्टीबायोटिक दवाओं का असर खत्म होने तक दूध का उपयोग नही किया जाना चाहिए है।
  • दूग्ध उत्पादन काल का कम हो जाना : थनैला रोग से संक्रमति पशु का कुल दूग्ध उत्पादन काल कम हो जाता है जिससे पशु का कुल दूग्ध उत्पादन कम हो जाता है। कई बार इसी कारण की वजह से पशु को बेचना भी पड़ जाता है।
  • बाजार में कम विक्रय मूल्य: रोग के कारण थनों के ऊतको को नुकसान  होने के वजह पशु का बाजार में विक्रय मूल्य कम हो जाता हैं। इस प्रकार पशुओं के प्रतिस्थापन के लिए अतिरिक्त धन की अनावश्यक जरूरत पड़ती है।
  • पशु चिकित्सा का खर्च: थनैला के कारण कई बार पशु के थन नलिका हमेशा के लिये पूर्ण रूप से बंद हो जाते तथा उपचार खर्च बहुत मंहगा होता है।
  • अतिरिक्त श्रम की लागत: थनैला रोग के उपचार के लिए अतिरिक्त श्रम की जरूरत होती है।
  • पशु की मौत: कभी-कभी थनैला से पशु की मौत‌‌‌भी हो जाती है।

थनैला रोग के लिए मददगार कारक

रोग फैलने के प्रमुख कारण रख रखाव एवं साफ सफाई का अच्छी तरह से न होना होता है। रोग का संचरण दूषित त्वचा पर यह जीवाणु धन की नलिका से प्रवेश कर रोग उत्पन्न करते है। रोग का संचरण एक पशु से दूसरे पशु में संक्रमित ग्वाले के हाथों के कारण फैलता है। इसलिये सबसे महत्वपूर्ण यह है कि एक पशु का दूध निकालने के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करके दूसरे पशु का दूध निकालना चाहिये, इससे रोग फैलने का खतरा कम हो जाता है। थनैला रोग दूधारू पशु के कारक, रोग जनकों व वातावरण पर निर्भर करता है। दूधारू पशु के कारक थनैला रोग के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता, पशु का सुरक्षा तन्त्र, दूधारू पशु का ब्यांत व तनाव कारकों की मौजूदगी पर निर्भर करते हैं।  दूध निकालने का वातावरण, दूध निकालने का तरीका, दूध दुहने के समय अपनायी गयी स्वच्छता प्रणाली, पशु गृह व उसमें मौजूद गन्दगी एवं मौसम आदि थनैला रोग का निर्धारण करते हैं। इसके अतिरिक्त संक्रमणता दूग्ध अवस्था के प्रारम्भिक चरण में भी ज्यादा रहती है तथापि नई संक्रमणता कभी भी हो सकती है। थनैला रोग के लिए प्रमुख मददगार कारक निम्न है।

  • थन पर बाहर से चोट, जख्म या खरोंच।
  • थन नलिका में असमान्यताएं।
  • दूध दोहने के समय अच्छी तरह सफाई का न होना।
  • थन पर गोबर एवं पेशाब, कीचड़ का लगना ।
  • समय पर दूध निकालने में देरी होना ।
  • बाड़े में फर्श (जमीन) पर हमेशा कीचड़/गंदगी का होना।
  • पिछले पैरों के ज्यादा बढ़े हुए नाखून।
  • पूरी तरह थन ग्रंथियों से दूध का न निकलना।
  • जेर अटकने का इतिहास एवं बच्चादानी में संक्रमण।
  • घटिया व असंतुलित पशु आहार।
  • रोजाना के आहार में मिनरल्स जैसे कोबाल्ट, कॉपर, फॉस्फोरस, सेलेनियम इत्यादि की कमी।

थनैला रोग के फैलने के तरीके

  1. संक्रामक थनैला रोग: इस प्रकार का रोग ग्रसित पशु से स्वस्थ पशु के बीच फैलता है। प्रमुख कारण स्टैफाईलोकोक्स ऑरीयस, स्ट्रेप्टोकोक्स एग्लेक्सिया व माइकोप्लाजमा जैसे जीवाणुओं के कारण होता है।
  2. पर्यायवरणीय थनैला रोग: इसमें थनैला रोग वातावरण से दूधारू पशु के बीच फैलता है। पर्यायवरणीय थनैला के रोगजनक जीवाणु दूधारू पशु के आसपास (मल-मूत्र, पशु के वातावरण, पशु के बिछावन व पानी) के वातावरण में रहते हैं। दूध निकालते समय या उससे पहले वातावरण में फैली गन्दगी के सम्पर्क में आने से रोग उत्पन्न हो जाता है। प्रमुख पर्यायवरणीय थनैला रोग जनक एचार्चिया कोलाई, स्ट्रेप्टोकोक्स व सूडोमोनास हैं लेकिन वातावरण में फैले अन्य जीवाणु जैसे फफूंद, वायरस भी पर्यायवरणीय थनैला रोग उत्पन्न करते हैं।
  3. थन की त्वचा से लेवटी में रोग जनकों का प्रवेश: यह आमतौर पर नकारात्मक कोगूलेज एन्जाईम पैदा करने वाले स्टैफाईलोकोक्स व कोरानीबैक्टिरीयम से होता है। इनको थनैला रोग के मामूली रोग जनक कहा जाता जो दूग्ध वाहिनी में संक्रमण पैदा करते हैं। थनों को जीवाणु नाशक घोल में डुबोने से इन रोग जनकों को समाप्त किया जा सकता है।
  4. पशु शिशु के मुँह से रोग जनकों का थन में प्रवेश: ज्यादा देर तक बछड़ो के दूध पीने से थनों के छिद्र खूल जाते हैं जिससे दूग्ध ग्रन्थि में संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।
  5. मख्खियों से: गर्मियों के मौसम में मख्खियों का प्रकोप ज्यादा हो जाता है जो थनैला रोग जनकों खासतौर पर एक्टीनोमायकोसिस पायोजिनिस के वाहक होते है। इन जीवाणुओं के कारण दूध से हटाई गई गायों व औसर बछड़ीयों की दूग्ध ग्रन्थियों में फोड़े व मवादयुक्त थनैला रोग उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त मख्खियाँ स्टैफाईलोकोक्स ऑरीयस जीवाणु के वाहक भी होते जिनसे थनैला रोग उत्पन्न होता है।

थनैला रोग के विभिन्न प्रकार

  1. अतितीव्र थनैला रोग: इसकी शुरूआत बहुत अचानक होती है जिसमें थन बहुत ज्यादा सूज जाते है व दूध पानी जैसा हो जाता है, एवं कभी- कभी दूध अचानक कम या खत्म हो जाता है। रोग जनकों के कारण, थनों के ऊत्तकों व जीवाणुओं के द्वारा उत्पन्न एन्जाईम से, आन्तरीक व बाह्य विषाक्त पदार्थों व ल्यूकोसाईट के कारण थनों में सूजन उत्पन्न होती है। इससे बुखार, चारा न खाना, उदासी, रूमेन की गतिशीलता में कमी, निर्जलीकरण व कभी-कभी पशु की मृत्यु भी हो जाती है। इसमें प्रारम्भिक लक्षण दूध व थनों में दिखायी देते हैं।
  2. तीव्र थनैला रोग: इस रोग की शुरूआत भी तीव्र होती है जिसमें थनों की सूजन मध्यम से बहुत ज्यादा होती है, दूध में कमी, पानी जैसा दूध या दूध में छेछड़े। इसके लक्षण भी अतितीव्र थनैला रोग जैसे ही होते है लेकिन तीव्रता थोड़ी कम होती है।
  3. अर्धजीर्ण थनैला रोग: इसमें सूजन कम होती है व थनों में कोई ज्यादा परिवर्तन देखने को नही मिलता। आमतौर दूध में छेछड़े ​‌‌‌दिखायी देते हैं तथा कभी कभी दूध के रंग में बदलाव आ जाता है, लेकिन आमतौर पर इसमें अन्य शारीरिक लक्षण ‌‌‌दिखायी नही देते है।
  4. जीर्ण थनैला रोग: जीर्ण थनैला रोग अस्पष्ट रोग के रूप में कई महीने तक हो सकता है जो कभी-कभी नैदानिक रूप में ‌‌‌दिखाई दे जाता है व ईलाज के बाद ठीक हो जाता है व फिर कुछ ‌‌‌दिनों बाद फिर नैदानिक रूप में हो जाता है। इस प्रकार यह रोग लम्बे समय तक चलता रहता है।
  5. उपनैदानिक रोग: अस्पष्ट थनैला रोग बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। यह नैदानिक थनैला रोग से 15 से 40 गुणा ज्यादा मिलता है। इसमें थन व दूध में ज्यादा परिवर्तन नही ‌‌‌दिखायी देता है। इसमें दूग्ध उत्पादन व दूग्ध गुणवत्ता धीरे-धीरे कम हो जाती है।

दूग्ध दोहन क्रिया और थनैला रोग से सम्बन्ध

दूग्ध दोहन में कई महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। जिनका मुख्य उद्देश्य दूध का पसाव, दूध निकालने के दौरान रोग जनकों का दूधारू पशु के सम्पर्क में आने की सम्भावना को कम करना व दूध को कुशलता से निकालना होता है। दूग्ध दोहन में निम्नलिखित प्रक्रियाएं होती हैं।

  • दूग्ध दोहन के लिए ग्वाला: गन्दे उपकरणों या रोग ग्रसित पशुओं से दूध दोहन करने वाले व्यक्ति के हाथ रोगजनकों के सम्पर्क से दूषित हो सकते हैं, अतः ढूध दुहने से पहले अच्छी तरह हाथो के सफाई जरुरी है।
  • थनों को साफ करना: सभी पशुओ में थनों की चमड़ी पर रोगाणु रहते  हैं जो थनैला रोग उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए दुहने से पहले थन व लेवटी को रोगाणुनाशक घोल से धोना चाहिए।
  • थनों को सूखाना: रोगाणु नाशक घोल से धोने के बाद थनों को साफ कपड़े के साथ पोंछकर सुखाना चाहिए। ऐसा करने से दूध के दूषित होने की सम्भावना कम रहेगी। दूध को रोगाणु नाशक दवा से दूषित होने से बचाने के लिए कई पशुओं को रोगाणु नाशक दवाई लगानी चाहिए फिर जिस पहली गाय को रोगाणु नाशक दवाई दवाई लगाई हो तो उसकी लेवटी व थनों को पोंछकर सुखाना चाहिए जो कि आसानी से सुखाई जा सकती है। इस प्रक्रिया में ध्यान रहे कि एक तौलिया केवल एक ही पशु में इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि संक्रमण एक पशु से दूसरे में न जा सके।
  • दूध की पहली धार को निकालना: दूध की पहली धार किसी छोटे व चौड़े मुँह वाले बर्तन में लेकर उसमें जमें हुए दूध के धब्बे चैक करने चाहिए। काले रंग की तली वाले बर्तन इसके लिए ज्यादा ठीक रहते हैं जिसमें दूध के सफेद रंग के धब्बे आसनी से चैक किये जा सकते हैं। यदि दूध में धब्बे दिखायी दे तो पशु चिकित्सक को सुचना देनी चाहिए एवं उसका उपचार करवाना चाहिए।
  • दूध की मशीन का उपयोग: पूरा दूध निकालने के लिए दूध निकालने की मशीन को साफ करने के एक मिनट अन्दर ही सही तरीके से लगा देनी चाहिए।
  • दूध निकालते समय मशीन का समय: ज्यादातर गायों का दूध 5 से 7 मिनट में निकल जाता है। दूध निकालने में ज्यादा समय लगने से थनैला रोग बढ़ने की सम्भावना ज्यादा रहती है।
  • दूध निकालने के बाद मशीन को हटाना: दूध निकालने की मशीन को हटाने से पहले उसको बन्द जरूर कर देना चाहिए। ऐसा न करने से थन के सुराख क्षतिग्रस्त हो जाएंगें जिससे दूग्ध वाहिनी बन्द होने का समय भी बढ़ जाएगा व थनैला रोग के बढ़ने की सम्भावना भी बढ़ जाएगी। आमतौर पर थन के सुराख को बन्द होने में एक घण्टे का समय लग जाता है। कई बार दूध निकालते समय दूध निकालने की मशीन को जोर से नीचे खींचा जाता है या मशीन को ज्यादा देर तक दूधारू पशु से चिपकाए रहते हैं ताकि ज्यादा दूध निकाला जा सके। या हाथ से भी दूध निकालते समय दूध की एक-एक धार निकालने की कोशिश की जाती है, जिस से थनैला रोग की सम्भवना भी बढ़ जाती है।
  • दूध निकालने के बाद थनों पर रोग नाशक दवाई का लगाना: जैसा कि विधित है कि दूध निकालने के एक घण्टा बाद तक दूग्ध वाहिनी खुली रहती है जिससे यह रोग उत्पन्न करने वाले रोगाणुओं के उसमे घुसने की सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है व रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिए दूध निकालने के बाद रोगाणु नाशक दवाई के घोल के साथ थनों को धोना चाहिए।
  • दूध निकालने के बाद दूधारू पशु का प्रबन्धन: दूध निकालने तुरन्त बाद पशु न बैठे। इसलिए दूध निकालने के बाद पशु को चारा खिलाना चाहिए ताकि वह खड़ा रहे। इस प्रक्रिया में लगभग एक घण्टा लग जाता है व दूग्ध वाहिनी भी बन्द हो जाती है। इससे थनैला रोग की सम्भावना भी कम रहेगी।

पशु आवास, पर्यावरण व थनैला रोग

थनैला रोग पशु गृह व गृह के वातावरण से बहुत प्रभावित होता है जिसमें निम्नलिखित मुख्य ​तथ्य इस प्रकार हैं।

  1. स्थान: उच्च तापमान व उच्च नमी वाली जगह पर थनैला रोग की सम्भावना ज्यादा होती है, क्युकि ऐसी जगहों पर कीट पतंगे व रोगाणुओं की संख्या ज्यादा होती है।
  2. मौसम: उच्च तापमान व उच्च नमी वाला मौसम थनैला के रोगाणुओं व रोग फैलाने वाले जीवों के लिए आदर्श होता है। ऐसे मौसम में पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। ऐसे मौसम में थनैला रोग की सम्भावना ज्यादा प्रबल होती है इसके विपरीत स​‌‌‌र्दियों में थनों की चमड़ी में छोटी-छोटी दरारें बन जाती हैं जिन में से रोगाणु आसानी से थन में प्रवेश कर थनैला रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
  3. पशुओं की संख्या: थनैला रोग किसी भी पशुशाला में पशुओं की संख्या कम या ज्यादा होने निर्भर नही करता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें पशुओं का प्रबन्धन कैसा है। यह रोग समान रूप से देखने को मिलता है। फिर भी य​दि किसी सुव्यवस्थित डेरी में प्रति पशु के हिसाब से क्षेत्रफल कम है व उसका प्रबन्धन निम्न स्तर का है तो उसमें थनैला रोग की सम्भावना ज्यादा ही रहती है।
  4. पशुशाला साफ-सफाई: पशुशाला में गोबर-मूत्र व बिछावन की साफ-सफाई न होने से दूधारू पशुओं में थनैला रोग के होने की संभावना ज्यादा होती है।
  5. पशुशाला का तल: जब भी पशु जमीन पर बैठता है तो उसके थन पशुशाला के तल के सम्पर्क में आते हैं। य​दि तल की साफ-सफाई नही होगी तो थनैला रोग की सम्भावना भी बढ़ जाएगी। पशुशाला के तल पर रेत ज्यादा तरल पदार्थों को सोखती है, बिछायी जा सकती है। रेत से गोबर को हटाने में थोड़ी समस्या जरूर आती है। रेत में ज्यादा मोटे कण न हो अन्यथा इससे खुरों में जख्म होने की सम्भावना रहती है। अन्य सामाग्री जैसे कि कड़बी, पराली या खराब चारा भी तल पर बिछाया जा सकता है लेकिन इसमें रोगाणु ज्यादा पनपते हैं।
  6. चारागाह व तालाब: पशुओं के लिए चरागाह बहुत अच्छी जगह है लेकिन वे गीली व कीचड़भरे न हों। पशु चरते समय आराम करने के लिए चारागाह में बैठता है व य​‌‌‌दि चारागाह गीली व कीचड़भरे  होंगे  तो थनैला रोग होने की सम्भावना बढ़ जाएगी। चारागाह वर्षा के मौसम में यह समस्या आती है। गर्मी के ​दिनों में चारागाह में पशु बहते हुये पानी या चारागाह में बने तालाबों बैठते हैं। उसी में ये पशु गोबर भी करते हैं जिससे पानी गन्दा हो जाता है व इससे थनैला रोग की सम्भावना भी बढ़ जाती है।

दूधारू पशु का शुष्क काल व थनैला रोग

ग्याभिन पशुओं का दूध उनके ब्याने से लगभग 50 – 60 दिन पहले निकालना बन्द कर देना चाहिए जिससे कि उसको आराम मिले व अगले ब्याँत में वह पूरा दूग्ध उत्पादित कर सके। यदि यह अवधि 40 दिन से कम रहती है तो अगले ब्याँत में पशु का दूग्ध उत्पादन कम होगा। दूध निकालना बन्द करने से पहले दूधारू पशु का दाना बन्द कर देना चाहिए व पानी भी कम कर देना चाहिए। ताकि उसको 50 दिन का ब्याने से पहले का समय मिल सके। इस अवधि को पशु का शुष्क काल कहा जाता है। कई बार शुष्क काल के कुछ समय बाद दूग्ध ग्रन्थि में दूध आ जाता है जिसको दोबारा से निकालना पड़ता है अन्यथा थनैला रोग की सम्भावना बढ़ जाएगी। इससे बचने के लिए पशु को शुष्क करने के उप्रान्त थनों में जीवाणु नाशक दवा डालनी चाहिए। इस दौरान पशु को सेलेनियम, विटामिन ए, विटामिन ई, जिंक, कॉपर, कोबाल्ट व अन्य जरूरी तत्व खुराक में प्रदान करने चाहिए। 

थनैला रोग के लक्षण

अलाक्षणिक या उपलाक्षणिक प्रकार के रोग में थन व दूध बिल्कुल सामान्य प्रतीत होते हैं लेकिन प्रयोगशाला में दूध की जाँच द्वारा रोग का निदान किया जा सकता है। जिस थन में यह बीमारी होती है उसमें से कम दूध निकलता है और दूध में फैट की मात्रा हमेशा कम ही रहती है। ऐसे थनैला का पशु चिकित्सक की मदद से पहचान कर के उसका तुरन्त इजाज करना बहुत लाभकारी साबित होता है। लाक्षणिक रोग में जहाँ कुछ पशुओं में केवल दूध में मवाद/छिछड़े या खून आदि आता है तथा थन लगभग सामान्य प्रतीत होता है वहीं कुछ पशुओं में थन में सूजन या कडापन/गर्मी के साथ-साथ दूध असामान्य पाया जाता है। कुछ असामान्य प्रकार के रोग में थन सड़ कर गिर जाता है। ज़्यादातर पशुओं में बुखार आदि नहीं होता। रोग का उपचार समय पर न कराने से थन की सामान्य सूजन बढ़ कर अपरिवर्तनीय हो जाती है और थन लकडी की तरह कडा हो जाता है। इस अवस्था के बाद थन से दूध आना स्थाई रूप से बंद हो जाता है। सामान्यतः प्रारम्भ में में एक या दो थन प्रभावित होते हैं जो कि बाद में अन्य थनों में भी रोग फैल सकता है। कुछ पशुओं में दूध का स्वाद बदल कर नमकीन हो जाता है। इस अलाक्षणिक प्रकार की बीमारी को समय रहते पहचानने के लिए निम्न प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं।

  1. पी.एच. पेपर द्वारा दूध का समय-समय पर जांच या संदेह की स्थिति में विस्तृत जांच।
  2. कैलिफोर्निया मॉस्टाईटिस सोल्यूशन के माध्यम से जांच।
  3. संदेह की स्थिति में दूध कल्चर एवं सेन्सीटिवीटी जांच।

इसके अलावे पशुओं का उचित रख रखाव, थन की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधियों का प्रयोग एवं रोग का समय रहते उचित ईलाज करना श्रेयस्कर हैं।

थनैला रोग का उपचार

रोग का सफल उपचार प्रारम्भिक अवस्थाओं में ही संभव है अन्यथा रोग के बढ़ जाने पर थन बचा पाना कठिन हो जाता है। इससे बचने के लिए दुधारु पशु के दूध की जाँच समय पर करवा कर जीवाणुनाशक औषधियों द्वारा उपचार पशु चिकित्सक द्वारा करवाना चाहिए। प्रायः यह औषधियां थन में ट्‌यूब चढा कर तथा साथ ही मांसपेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है। थन में ट्‌यूब चढा कर उपचार के दौरान पशु का दूध पीने योग्य नहीं होता। अतः अंतिम ट्‌यूब चढने के 48 घंटे बाद तक का दूध प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। यह अत्यन्त आवश्यक है कि उपचार पूर्णरूपेण किया जाये, बीच में न छोडें। इसके अतिरिक्त यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि (कम से कम) वर्तमान ब्यांत में पशु उपचार के बाद पुनः सामान्य पूरा दूध देने लग जाएगा।

थनैला रोग से रोकथाम

थनैला बीमारी से अर्थिक क्षति का मूल्याकंन करने के क्रम में एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है, कि प्रत्यक्ष रूप मे यह बीमारी जितना नुकसान करती हैं, उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष रूप में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान पहुचाती हैं। कभी-कभी थनैला रोग के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं परन्तु दूध की कमी, दूध की गुणवत्ता में ह्रास होता है, कभी-कभी थन आंशिक या पूर्णरूपेण क्षति हो जाता है, तथा कभी कभी बीमारी अगले बियान के प्रारंभ में प्रकट होती है। थनैला रोग की रोकथाम जरूरी है क्योंकि यह एक संक्रामक रोग है तथा एक पशु से दूसरे पशु में संचारित होता है। थनैला बीमारी की रोकथाम प्रभावी ढ़ंग से करने के लिए निम्नलिखित विन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

  • पशुओं के बांधे जाने वाले स्थान/बैठने के स्थान व दूध दुहने के स्थान की सफाई का विशेष ध्यान रखें, जोकि नियमित रूप से होनी चाहिए। इसके लिए फिनाईल के घोल तथा अमोनिया कम्पाउन्ड का छिड़काव करना चाहिए।
  • पशुशाला के आसपास के वातावरण की साफ-सफाई जरूरी है तथा जानवरों का आवास हवादार होना चाहिये।
  • थनों का समय-समय पर परीक्षण करते रहना चाहिये। उनमें कोई गठान एवं दूध में थक्के हो तो थनैला रोग के लक्षण होते है। समय-समय पर दूध की जाँच (काले बर्तन पर धार देकर) या प्रयोगशाला में करवाते रहें। सामान्य दशा से कोई परिवर्तन दिखने पर तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेना चाहिये।
  • दूध दुहने की तकनीक सही होनी चाहिए जिससे थन को किसी प्रकार की चोट न पहुंचे।
  • थन में किसी प्रकार की चोट (मामूली खरोंच भी) का समुचित उपचार तुरंत करायें।
  • थन का उपचार दुहने से पहले व बाद में दवा के घोल में (पोटेशियम परमैगनेट 1:1000 या क्लोरहेक्सिडीन 5 प्रतिशत) डुबो कर करें। इसके लिए सेवलोन का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस्तेमाल करने व कीटाणु नाशी घोल बनाने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
  • दूध की धार कभी भी फर्श पर न मारें।
  • दूध की दुहाई निश्चित अंतराल पर की जाय।
  • शुष्क पशु उपचार भी ब्यांने के बाद थनैला रोग होने की संभावना लगभग समाप्त कर देता है। इसके लिए पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
  • रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें तथा उन्हें दुहने वाले भी अलग हों। अगर ऐसा संभव न हो तो रोगी पशु सबसे अंत में दुहें।
  • फर्श सूखा एवं साफ होना चाहिये।
  • एक पशु का दूध निकालने के बाद ग्वाले को अपने हाथ अच्छी तरह से धोना चाहिये।
  • थनैला होने पर तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह से उचित इलाज कराया जाय।

थनैला रोग का घरेलु उपचार

नीचे बताये गए घरेलू उपचारों की कोई वैज्ञानिक पुष्टि तो नहीं है लेकिन गावों में काफी प्रचलित है और किसान और पशु पालको के द्वारा प्रोयोग किये जाते है तथा उनके अनुसार ये काफी लाभप्रद नुस्खे है 

  1. अरण्डी का तैल चार बार कपड़े मे छानकर गरम करके पशु के थन मे धीरे- धीरे मालिश करने से थनैला रोग में आराम मिलता है।
  2. दही आधा किलो और गुड एक पाव सुबह- सायं खिलाना भी लाभकारी हैं ।
  3. गाय का घी एक पाव , कालीमिर्च आधा छटाक और नींबू का रस एक छटाक लें । इन तीनों को एक ही साथ मिलाकर पिलायें , लाभप्रद हैं।
  4. पोस्ता का फल तथा नीम की पत्ती की भाप देना भी लाभप्रद हैं।
  5. गन्धक की धूनी देने से भी लाभ होता हैं।
  6. नीम के उबले हुऐ गुनगुने पानी से रोगी पशु के दूग्धकोष को दोनों समय , आराम होने तक, सेंका जाय और फिर नीचे लिखें लेप किये जायें । आँबाहल्दी २४ ग्राम , फिटकरी १२ ग्राम , गाय का घी ४८ ग्राम , दोनों को महीन पीसकर , छानकर , घी में मिलाकर , रोगी पशु के थन मे , दोनों समय आराम होने तक लेप करें

थन की सूजन  की अवस्था में

  1. हल्दी १२ ग्राम , सेंधानमक ९ ग्राम को महीन पीसकर ३६ ग्राम गाय के घी में मिलाकर, रोगी पशु को दोनों समय, दूध निकालने के पहले और दूध निकालने के बाद , अच्छा होने तक ,लगायें। 
  2. रोगी मादा पशु के थनो में नीम के उबले हुए गुनगुने पानी सें सेंकना चाहिए । सेंककर दवा लगा दी जाय।
  3. तिनच ( काला ढाक ) की अन्तरछाल को छाँव में सुखाकर, बारीक कूटकर, पीसकर तथा कपडें में छानकर १ ० ग्राम पाउडर को १२ ग्राम गाय के घी  में मरहम बनाकर रोगी पशु को दोनों समय अच्छा होने तक लगाना चाहिए।

बिना सूजन के दूध में ख़ून आने की दशा में

१- सफ़ेद फिटकरी फूला २५० ग्राम , अनारदाना १०० ग्राम , पपड़ियाँ कत्था ५० ग्राम , कद्दू मगज़ (कद्दूके छीलेबीज) ५० ग्राम, फैड्डल ५० ग्राम , सभी को कूट-पीस कर कपडे से छान लें ।५०-५० ग्राम की खुराक बनाकर सुबह-सायं देने से ख़ून आना बंद हो जाता है । 
२- थन को रोज़ाना दोनों समय पत्थरचटा की धूनी देनी चाहिए। 

३- पके केले में कर्पुर १ गोली रोज़ देने से भी खून आना रुक जाता है। 

लेखक: डॉ. मुकेश श्रीवास्तव

पंडित दीनदयाल पशु चिकित्सा विज्ञानं विश्व विद्यालय एवं गौ अनुसन्धान, मथुरा

पिक   क्रेडिट :  स्निपर  क्रीक  फार्म 

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