कठिन प्रसव: पशुओं की कष्टदायक स्थिती

प्रसव की वह स्थिती जिसमें मादा अपने स्वयं के प्रयासों से बच्चे को जन्म नही दे पाती है उसे कष्ट प्रसव (Animals Delivery) कहते है।

कष्ट प्रसव के कारण

  1. माँ से सम्बन्धित कारण
  2. प्युबिक बोन के फ्रैक्चर (fracture), ट्यूमर (Tumor), हिप डिस्लोकेशन (Hip dislocation) के कारण जन्मनाल छोटी ही जाती है।
  3. गर्भाशय का अपने अक्ष पर घूम जाना
  4. गर्भाशय का शिथिल हो जाना जुडवा बच्चे
  5. गर्भाशय मे ट्यूमर (Uterine tumor)
  6. बच्चे का बडा आकार
  7. सर्विक्ष (cervix) का कम खुलना

कठिन प्रसव में बच्चे से सम्बन्धित कारण

  1.  बच्चे का बडा आकार
  2. गर्भ मे नर बच्चा
  3. हाईड्रोप्सी (Hydrops), एसाइटिस (Acities), एनासर्का(Anacerka), सिर का बडा आकार(Big Head of Foetus), गांठ (Lump)
  4. स्टील भ्रूण (Stillbirth), ममीकृत भ्रूण (Fetal Mummification)
  5. जन्मनाल मे बच्चे की असामान्य प्रसूति

अन्य कारण

  1. पशु नस्ल – विदेषी नस्ल मे अधिक होता है
  2. मादा की कम उम्र तथा विदेषी सांड से प्रजनन
  3. बच्चे का लिंग
  4. आनुवांषिक कारण
  5. अन्त प्रजनन

प्रसूति – Animals Delivery

जन्मनाल मे बच्चे की रीड की हड्ड़ी तथा माँ की रीड की हड्डी के संबंध को प्रसूति कहते है।
  1.  अग्र अनुदैर्ध्य प्रसूति – इसमे बच्चे का मेरुदण्ड (spinal cord) माँ के मेरुदण्ड के समान्तर होता है और सिर व आगे के दोनों पैर जन्मनाल मे आगे की तरफ होते है। यह सामान्य प्रसूति कहलाता है।
  2. पश्च अनुदैर्ध्य प्रसूति – इसमे बच्चे का मेरुदण्ड (spinal cord) माँ के मेरुदण्ड के समान्तर होता है किन्तु इसमें बच्चे के पीछे वाले दोनों पैर आगे आते है। यह भी सामान्य प्रसूति होता है। 1 व 2 के अतिरीक्त सभी प्रसूति असामान्य होते है तथा कष्टप्रसव की स्थिती उत्पन्न करते है।
  3. आडा प्रसूति – जब फीटस / भ्रूण (Fetus) जन्मनाल मे बिल्कुल आडा हो इस स्थिती को आडा प्रसूति कहत है।
  4. पीछे का भाग प्रसूति – आडा प्रसूति मे जब बच्चे के पीछे के पैर भी आगे की तरफ जन्मनाल मे शरीर के नीचे हो इस स्थिती को प्रसूति कहते है।

आसन

बच्चे का सिर, गर्दन तथा अगले पिछले पैरों का उसके शरीर से सम्बन्ध आसन कहलाता है। उदाहरण- गर्दन का उपर नीचे दाये बाये मुड जाना, पैरो का पीछे-आगे मुड जाना, एक या दोनों  पैरो का मुडकर जन्मनाल मे रह जाना आदि।

कठिन प्रसव की चिकित्सा

  • पशु को साफ सुथरे स्थान पर ले जावे ।
  • पशु को आवश्यकता अनुसार एपीड्यूरल एपिदुरा निचेतक (Epidural Anesthesia) अथवा प्रशांतक दे।
  • हाथों मे दस्ताने पहने, चिकना करे तथा जन्मनाल मे हाथ डालकर बच्चे का सही प्रसूति तथा आसन ज्ञात करे।
  • बच्चा जिन्दा है या अथवा मृत, किसी भी प्रकार की विकृति, जुडवा बच्चे आदि स्थितियों का पता कर उपचार प्रारंभ करे।

वह क्रियाए जिनके द्वारा माँ तथा बच्चा दोनो को कोई नुकसान पहुंचाए बिना प्रसव करवाया जाता है उनको प्रसूति ऑपरेशन (Animals Delivery) कहते है, जो कि निम्न प्रकार से है –

  1.  उत्परिर्वन
  2. बलनिष्कर्षण
  3. भ्रूण छेदन (Fetal perforation)
  4. प्रसूति शल्य चिकित्सा (Obstetric surgery)
  5. लेप्रो गर्भाशय शल्य चिकित्सा (Laparoscopic surgery)

उत्परीवर्तन – वे क्रियाए जिनके द्वारा बच्चे के प्रसूति, स्थिति तथा आसन को जन्मनाल मे ठीक किया जाता है उत्परीवर्तन कहलाती है जो   कि निम्न प्रकार होती है।

  1. प्रतिकर्षण – वे क्रियाएं जिनके द्वारा बच्चे को जन्मनाल से धक्का देकर उदरीय गुहा मे पहुंचाया जाता है वे प्रतिकषर्ण कहलाती है। ये क्रियाएं इसलिये की जाती है क्योंकि कि जन्मनाल मे बच्चे के प्रसूति, स्थिति तथा आसन को ठीक करने के लिये समुचित स्थान नही होता है जो कि उदरीय गुहा में मिल जाता है। जहाँ पर कि ये क्रियाएं आसानी से की जा सकती है। बच्चों को तथा उसके अंगो को आसानी से घुमाया जा सकता है।
  2. घूर्णन – बच्चे को जन्मनाल से प्रतिकर्षण क्रियाओं द्वारा उदरीय गुहा मे ले जाकर उसको घुमाकर टोरसोसेक्रल स्थिति मे लाया जाता है।
  3. वर्जन – बच्चे को आडा अक्षीय पर घुमाने की क्रियाओं को वर्जन कहते है। इन क्रियाओं द्वारा बच्चे के आडा प्रसूति को अग्र अथवा पश्च प्रसूति मे लाया जाता है।

बल निष्कर्षण – बाह्य बल लगाकर बच्चे को जन्मनाल के रास्ते बाहर निकालने कि क्रिया को बल निष्कर्षण कहते है। इसके लिये चैन अथवा रस्सी बच्चे के पैर पर बांध दी जाती है, तब बल लगाया जाता है। चैन या रस्सी को बच्चे के जबडे पर भी बांधकर संकर्षण दिया जा सकता है किन्तु जबडे पर कम बल लगाना चाहिये अन्यथा जबडा टूट सकता है। अगर बच्चा मृत है तो उसकी गर्दन पर भी रस्सी या चैन को बांधकर संकर्षण दिया जा सकता है किन्तु इस स्थिती मे एक हाथ को बच्चे के सिर के उपर रखकर बाहर को दिषा देनी चाहिये ताकि सिर नही घुम पावें। एक हुक का प्रयोग बच्चे की आइ ओरबिट पर लगकर संकर्षण देने मे किया जा सकता है। किन्तु, इस विधि मे भी कम बल लगाना चाहिये अन्यथा ललाट हड्ड़ी टूट सकती है। पश्च प्रसूति मे भी चैन या रस्सी को पिछले पैरो के पेस्टर्ण संधि पर बांधकर संकर्षण दिया जा सकता है। संकर्षण सभी स्थितियों मे नीचे की ओर देना चाहिये क्योंकि बच्चा धनुषाकार स्थिति मे आसानी से निकलता है।

भ्रूणछेदन – उपरोक्त क्रियाओं से बच्चा बाहर नही निकल पा रहा हो और मर भी गया हो उस स्थिति में भ्रूणछेदन द्वारा बच्चे के अंगो को आवश्यकतानुसार काटकर प्रसव कराया जा सकता है। प्रसूति शल्य चिकित्सा (obstetric surgery) – बच्चा जीवित हो तथा उत्परिवर्तन क्रियाओं द्वारा बाहर निकाल पाना संभव नही हो तो प्रसूती शल्य चिकित्सा द्वारा बच्चे को निकाला जा सकता है।

लेप्रो गर्भाशय शल्य चिकित्सा (Laparoscopic surgery)- विशेष परिस्थितियों मे जब बच्चा मर गया हो, गैंगरीन (Gangrene) बन गया हो और गर्भाशय भी संक्रमण के कारण विकृत हो गया हो तब लेप्रो गर्भाशय शल्य चिकित्सा कर बच्चे को गर्भाशय सहित निकाल लिया जाता है।


डॉ. राजेश कुमार

स्नातकोत्तर पशुचिकित्सा षिक्षा एवं अनुसंधान संस्था,
पी.जी.आई.वी.ई.आर, जयपुर

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